भीमा कोरेगांव: वह सब जो आपको जानना चाहिए
प्रस्तावना
हर साल 1 जनवरी को महाराष्ट्र के पुणे जिले के एक छोटे से गाँव — भीमा कोरेगांव में लाखों लोग इकट्ठा होते हैं। ये लोग किसी मेले में नहीं आते, किसी त्योहार पर नहीं — वे आते हैं उस ऐतिहासिक क्षण को याद करने, जब सन् 1818 में मुट्ठी भर महार सैनिकों ने एक विशाल सेना को धूल चटा दी थी। यह सिर्फ एक युद्ध की कहानी नहीं है — यह उन लोगों के स्वाभिमान, साहस और संघर्ष की कहानी है जिन्हें सदियों से जाति-व्यवस्था ने दबाकर रखा था।
भीमा कोरेगांव का नाम आते ही दो बातें दिमाग में आती हैं — 1818 की ऐतिहासिक लड़ाई और 2018 की हिंसा। दोनों के बीच 200 साल का फासला है, लेकिन दोनों का केंद्र वही है — जाति, सत्ता, और सामाजिक न्याय।
इस लेख में हम इस पूरे विषय को समझेंगे — एकदम शुरू से, बिल्कुल सरल भाषा में।
पृष्ठभूमि: 1818 से पहले का भारत
पेशवा शासन और जाति-उत्पीड़न
18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी की शुरुआत में मराठा साम्राज्य का एक शक्तिशाली गुट था — पेशवा। पेशवा ब्राह्मण मूल के थे और उनका शासन पुणे से चलता था। इतिहासकारों के अनुसार, पेशवा शासन में जाति-आधारित भेदभाव अपने चरम पर था:[1]
- महार, मांग, चांभार जैसी दलित जातियों को गाँव में प्रवेश करते समय अपने गले में मटका और कमर में झाड़ू बांधनी पड़ती थी — ताकि उनकी थूक और पदचिह्न जमीन पर न पड़े।
- उन्हें सार्वजनिक कुओं से पानी लेने, मंदिरों में जाने और सड़कों पर चलने का अधिकार नहीं था।
- सेना में भर्ती और सम्मानजनक रोज़गार से उन्हें वंचित किया जाता था।
यही कारण था कि जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने महार जाति के लोगों को अपनी सेना में भर्ती किया, तो उनमें अपना सर्वश्रेष्ठ देने का जज्बा था ।[2][1]
तीसरा आंग्ल-मराठा युद्ध (1817–1818)
भीमा कोरेगांव की लड़ाई तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध का हिस्सा थी। इस युद्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और पेशवा बाजीराव द्वितीय के बीच सत्ता-संघर्ष था। अंग्रेज पूरे भारत पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते थे, और पेशवा उन्हें रोकने की आखिरी कोशिश कर रहे थे ।[1]
1 जनवरी 1818: वह ऐतिहासिक दिन
युद्ध से पहले की स्थिति
31 दिसंबर 1817 की रात, ब्रिटिश सेना की एक टुकड़ी — कैप्टन फ्रांसिस स्टॉन्टन के नेतृत्व में — शिरूर से पुणे की ओर मार्च कर रही थी। इस टुकड़ी में कुल 834 सैनिक थे, जिनमें से लगभग 500 सैनिक महार जाति के थे — ये बॉम्बे नेटिव इन्फेंट्री का हिस्सा थे ।[3]
रास्ते में उन्हें खबर मिली कि पेशवा की 28,000 सैनिकों की विशाल सेना पुणे की ओर बढ़ रही है । संख्या में भारी असंतुलन था — एक तरफ 834 सैनिक, दूसरी तरफ 28,000।[3]
युद्ध का घटनाक्रम
1 जनवरी 1818 की सुबह, भीमा नदी के किनारे स्थित कोरेगांव गाँव के पास दोनों सेनाएं आमने-सामने हुईं:[1]
- कैप्टन स्टॉन्टन ने अपनी टुकड़ी को भीमा नदी के किनारे एक मिट्टी की दीवार से घिरी छोटी बस्ती में तैनात किया
- पेशवा ने अरब, गोसाईं और मराठा सैनिकों की तीन अलग-अलग टुकड़ियाँ भेजीं — हर टुकड़ी में 300 से 600 सैनिक
- पेशवा की सेना ने दो तोपों और रॉकेट से हमला किया[4]
- पूरे दिन भीषण युद्ध चला — ब्रिटिश टुकड़ी ने अदम्य साहस के साथ मोर्चा थामे रखा
- शाम होते-होते पेशवा की सेना का मनोबल टूट गया और वे पीछे हट गए[3]
युद्ध का परिणाम
यह युद्ध निर्णायक था — पेशवा की सेना पूरी तरह हारी, अंग्रेजों की जीत पूरी तरह पक्की हुई। लेकिन प्रतीकात्मक रूप से यह बहुत बड़ी जीत थी:[2]
- 834 सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी ने 28,000 की सेना को पीछे धकेल दिया
- ब्रिटिश सेना के 49 सैनिक शहीद हुए — जिनमें अधिकांश महार थे
- पेशवा को अंततः 13 जून 1818 को आत्मसमर्पण करना पड़ा, जिससे पेशवाई का अंत हुआ[1]
- इस जीत के बाद अंग्रेजों ने पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी भारत पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया
विजय स्तंभ: सम्मान का प्रतीक
युद्ध में शहीद हुए महार सैनिकों की याद में अंग्रेजों ने भीमा कोरेगांव गाँव में एक विजय स्तंभ (Victory Pillar) बनवाया । इस स्तंभ पर उन 49 वीर सैनिकों के नाम खुदे हैं जिन्होंने इस लड़ाई में अपनी जान दी।[2]
आज यह विजय स्तंभ दलित समुदाय के लिए तीर्थस्थल बन चुका है। हर साल 1 जनवरी को यहाँ लाखों लोग — खासकर महार और दलित समुदाय के लोग — श्रद्धांजलि देने और अपने पूर्वजों की वीरता को याद करने आते हैं ।[1]
डॉ. भीमराव अंबेडकर और भीमा कोरेगांव
भीमा कोरेगांव और डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर का रिश्ता बहुत गहरा है। 1 जनवरी 1927 को डॉ. अंबेडकर खुद भीमा कोरेगांव गए और वहाँ शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की । यह पहली बार था जब इस स्थान को दलित अस्मिता और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुत किया गया।[2]
डॉ. अंबेडकर ने इस लड़ाई को इस तरह देखा:
- यह केवल एक सैन्य युद्ध नहीं था — यह जाति-उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध था
- महार सैनिकों ने न केवल दुश्मन से लड़ाई लड़ी, बल्कि उस व्यवस्था को चुनौती दी जो उन्हें इंसान से कम समझती थी
- पेशवा शासन का अंत दलितों के लिए एक प्रकार की मुक्ति था
तब से यह दिन “शौर्य दिवस” के रूप में मनाया जाने लगा ।[5]
2018 की हिंसा: 200 साल बाद आग
क्या हुआ था?
31 दिसंबर 2017 और 1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक विशाल कार्यक्रम आयोजित हुआ। इसमें देशभर से लाखों दलित समुदाय के लोग जमा हुए ।[6]
लेकिन इसी दौरान व्यापक हिंसा भड़क उठी। 29 दिसंबर 2017 को पास के वाडू बुद्रुक गाँव में गोविंद गायकवाड़ की समाधि को लेकर विवाद हुआ — गायकवाड़ वही व्यक्ति थे जिन्होंने कथित तौर पर 1818 में छत्रपति संभाजी महाराज के शव के अंतिम संस्कार में मदद की थी ।[6]
1 जनवरी 2018 को जब लोग कोरेगांव लौट रहे थे, तब पत्थरबाज़ी और हिंसा हुई। इसमें एक युवक की मौत हुई और कई वाहन जला दिए गए ।[6]
महाराष्ट्र बंद और देशव्यापी प्रभाव
हिंसा की प्रतिक्रिया में दलित संगठनों ने 2 जनवरी 2018 को महाराष्ट्र बंद का आह्वान किया। इस बंद के दौरान:
- मुंबई, पुणे, नागपुर सहित पूरे महाराष्ट्र में हिंसा और आगजनी की घटनाएं हुईं
- सार्वजनिक परिवहन ठप रहा, दुकानें बंद रहीं
- पुलिस और प्रशासन को व्यापक तैनाती करनी पड़ी
- राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक बहस छिड़ गई
भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद केस
2018 की हिंसा के बाद पुणे पुलिस ने एक बड़ी जाँच शुरू की जिसे भीमा-कोरेगांव एल्गार परिषद केस कहा जाता है । इस केस में:[6]
- 31 दिसंबर 2017 को एल्गार परिषद नाम का एक कार्यक्रम पुणे में हुआ था जिसमें भड़काऊ भाषण दिए गए — ऐसा पुलिस का आरोप था
- पुलिस ने दावा किया कि इस कार्यक्रम के पीछे माओवादी/नक्सली संगठनों का हाथ था
- इस केस में 16 से अधिक बुद्धिजीवियों, वकीलों, कार्यकर्ताओं और कवियों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें शामिल हैं:
- वरवर राव (तेलुगू कवि)
- सुधा भारद्वाज (श्रमिक अधिकार वकील)
- आनंद तेलतुम्बडे (सामाजिक विचारक)
- गौतम नवलखा (पत्रकार)
- रोना विल्सन (मानवाधिकार कार्यकर्ता)
- इस केस की जाँच बाद में NIA (राष्ट्रीय जाँच एजेंसी) को सौंपी गई
यह केस आज भी देश की न्यायिक और राजनीतिक बहस का केंद्र है। आलोचकों का कहना है कि यह सामाजिक कार्यकर्ताओं को चुप कराने की कोशिश है, जबकि जाँच एजेंसियों का दावा है कि ये लोग माओवाद से जुड़े थे ।[6]
ऐतिहासिक विवाद: युद्ध की असली व्याख्या क्या है?
भीमा कोरेगांव की लड़ाई को लेकर दो प्रमुख दृष्टिकोण हैं, और दोनों को समझना जरूरी है:[7]
| दृष्टिकोण | क्या कहता है? |
| दलित/अंबेडकरवादी दृष्टिकोण | यह जाति-उत्पीड़न के खिलाफ महार सैनिकों का प्रतिरोध था; पेशवा शासन का अंत दलितों की मुक्ति थी |
| वैकल्पिक इतिहासकारों का दृष्टिकोण | यह तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध का एक सामरिक हिस्सा था; दोनों तरफ महार सैनिक थे; इसे केवल जातिगत रंग देना सरलीकरण है |
सच्चाई यह है कि दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं — सैन्य दृष्टि से यह तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध का हिस्सा था, और सामाजिक दृष्टि से इसने दलित चेतना और प्रतिरोध का प्रतीक बनने की यात्रा तय की। इतिहास को एकांगी नजरिए से नहीं देखना चाहिए।
भीमा कोरेगांव का सामाजिक महत्व
यह स्थान और यह घटना भारतीय समाज के लिए कई कारणों से महत्वपूर्ण है:[2]
- दलित अस्मिता का प्रतीक: यह स्थल दलित समुदाय के लिए गर्व और प्रेरणा का स्रोत है — यह बताता है कि उनके पूर्वज बहादुर थे, योद्धा थे
- सामाजिक समानता का संदेश: जाति-व्यवस्था की बेड़ियों के बावजूद उन सैनिकों ने अपनी काबिलियत साबित की
- डॉ. अंबेडकर की विरासत: बाबासाहेब ने इसे जन-जागृति का माध्यम बनाया, और आज यह उनकी सामाजिक क्रांति का हिस्सा है
- संवैधानिक मूल्यों की याद: यह घटना हमें याद दिलाती है कि समता, स्वतंत्रता और न्याय — ये केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि लोगों ने इनके लिए लहू बहाया है
कानूनी और संवैधानिक पहलू: एक वकील की नजर से
भीमा कोरेगांव केस भारतीय कानून व्यवस्था के लिए कई महत्वपूर्ण सवाल उठाता है:
UAPA (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) का इस्तेमाल
इस केस में गिरफ्तार लोगों पर UAPA की धाराएं लगाई गईं। यह कानून आतंकवादी और माओवादी गतिविधियों को रोकने के लिए बना है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसका इस्तेमाल असहमति की आवाजें दबाने के लिए हो रहा है। UAPA में जमानत मिलना बेहद मुश्किल होता है, जिससे आरोपी वर्षों तक जेल में रहते हैं।
“अर्बन नक्सल” की अवधारणा
इस केस ने “अर्बन नक्सल” शब्द को राष्ट्रीय विमर्श में ला दिया — यानी ऐसे शहरी बुद्धिजीवी जो कथित रूप से माओवादियों का समर्थन करते हैं। इस अवधारणा पर बहस आज भी जारी है।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने कई आरोपियों की गिरफ्तारी पर सुनवाई की। न्यायालय ने इस केस में जाँच की निष्पक्षता पर भी टिप्पणियाँ कीं। कुछ आरोपियों को स्वास्थ्य आधार पर अंतरिम जमानत मिली।
अधिवक्ताओं के लिए जरूरी जानकारी: यदि आप UAPA, माओवाद-संबंधी मामले, या दलित अधिकार कानूनों में काम करते हैं, तो भीमा कोरेगांव केस के न्यायिक दस्तावेज एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु हैं।
भीमा कोरेगांव और आज का भारत
आज जब हम भीमा कोरेगांव की बात करते हैं, तो यह केवल एक पुराने युद्ध की चर्चा नहीं है। यह आज के भारत के उन सवालों से जुड़ा है जो अभी भी अनसुलझे हैं:
- क्या हमारे समाज में जाति-भेदभाव वाकई खत्म हुआ है?
- क्या दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोगों को संविधान में दिए गए अधिकार वास्तव में मिल रहे हैं?
- क्या असहमति और विरोध की आवाज को देशद्रोह कहकर दबाया जाना उचित है?
- क्या इतिहास को केवल एक नजरिए से देखना सही है?
ये सवाल असहज करने वाले हैं — लेकिन एक स्वस्थ लोकतंत्र में इन्हें पूछा जाना जरूरी है।
निष्कर्ष
भीमा कोरेगांव सिर्फ एक गाँव का नाम नहीं है। यह भारतीय इतिहास की एक बहुपरतीय कहानी है — वीरता की, उत्पीड़न की, प्रतिरोध की, और न्याय की लंबी यात्रा की।[2]
1818 में जब उन महार सैनिकों ने लड़ाई लड़ी, तो वे शायद नहीं जानते थे कि 200 साल बाद भी उनकी कहानी लोगों को प्रेरित करेगी। डॉ. अंबेडकर ने उस कहानी को चेतना का हथियार बनाया। और आज यह स्थान उन सभी के लिए जीवित है जो मानते हैं कि हर इंसान की गरिमा बराबर है।
भारत को एक न्यायपूर्ण समाज बनाने की राह आसान नहीं है — लेकिन भीमा कोरेगांव हमें याद दिलाता है कि यह राह संभव है।
- https://testbook.com/hi/ias-preparation/battle-of-bhima-koregaon
- https://testbook.com/hi/ias-preparation/203rd-anniversary-of-the-bhima-koregaon-battle
- https://www.youtube.com/watch?v=gLtj_2OF5EY
- https://hi.wikipedia.org/wiki/कोरेगाँव_की_लड़ाई
- https://www.youtube.com/watch?v=-ioSnU3wDno
- https://www.bbc.com/hindi/topics/c909d43xj16t
- https://www.youtube.com/watch?v=mk-_QMt5EAM
- https://www.youtube.com/watch?v=cHbpw4SJ-b8
- https://www.youtube.com/watch?v=jiwdzLo3BlU
- https://www.youtube.com/watch?v=inSQbB0eL3s
















